अल्टीमेट फ्लॉप्स: भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची

पूर्व  में कुछ ऐसी कार्स थीं जो भारतीय सडकों पर कुछ समय के लिए दिखाई दीं परन्तु बाद में बहुत ही कम दिखीं क्योंकि कंपनी ने  कम सेल्स की वजह से उन्हें बंद दिया जिसके कई कारण थे।  कुछ कार्स अपने समय से पहले की थीं।  कुछ मामलों में कार कम्पनीज के पास कार की मार्केटिंग करने की ताक़त नहीं थी।  और कुछ मामलों कार ही ख़राब थीं।  

हमनें भारत में बुरी तरह फ्लॉप हुई 10 कारों की सूची तैयार की जिनमें असल में हिट होने की काबलियत थी  पर वे फ्लॉप निकलीं  और शायद ही खरीदी गयीं. डालें नज़र और बताएं अगर और भी ऐसे कारें है जो इस सूची में शामिल हो सकती हैं।

सिपानी डॉलफिन (1982-1990)

क्यों फ्लॉप हुई: अनसुनी कंपनी , ख़राब मार्केटिंग। मारुती 800 ने इसका खात्मा किया।

sipani dolphin photo

सिपानी ऑटोमोबाइल्स कर्नाटक में स्थित एक कम परिचित ऑटोमोटिव कंपनी है. इन्होनें थ्रीव्हिल्ड बादल (रिलायंट रोबिन पर आधारित ) जैसे कार्स बनायीं जो की बाद में 1982 में डॉलफिन (रिलायंट किटेन पर आधारित) में तब्दील हो गयीं. डॉलफिन की आलफाइबर ग्लास बॉडी थी और शुरुआत में टूडोर संस्करण में आयी। इसमें 848-cc 4-सिलिंडर इंजन, 4 –स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन और रियरव्हील ड्राइव थी।  कार की परफॉरमेंस काफी बेहतर थी और चाहने वालों को काफी पसंद आयी।  मगर टूडोर फाइबर ग्लास बॉडी के कारण इसकी बिक्री ज़्यादा नहीं हुई। 1983 में मारुती 800 ने डॉलफिन को पीछे धकेल दिया और इस की जगह सिपानी मोंटाना ने ली जो की फोरडोर संस्करण था। इस कार की भी ज़्यादा बिक्री नहीं हुई।  सिपानी ने मारुती 800 को टक्कर देने के लिए एक और कार लांच की।  1989 में सिपानी D-1 लांच की गयी जिसमे 1.5 लीटर का डीजल इंजन और फाइबर गिलास था. मगर कमज़ोर मार्केटिंग और ख़राब आफ्टरसेल्स सर्विस की वजह यह कार भी नाकाम रही और 1990 तक यह कार भी  मार्किट से चली गयी.

रोवर मोंटेगो (1991-1995)

क्यों फ्लॉप हुई: काफी महंगी और सिपानी की ख़राब मार्केटिंग और आफ्टरसेल्स सर्विस  

rover montego india photo

सिपानी ऑटोमोबाइल भारत में एक ऐसी ऑटोमोबाइल कंपनी है जो अपने लगभग हर उत्पात में विफल रही. तीन फाइबरग्लास  करोंडॉलफिन, मोंटाना, और डी-1 — के बाद उसने भारत की पहली लग्जरी कारों में से एक लांच कीरोवर मोंटेगो — दो संस्करण में।  1991 में मोंटेगो सेडान और स्टेशनवैगन संस्करण में उपलब्ध थी।  इसमें 2-लीटर इंजन, 5-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन, पावर  स्टीयरिंग, विंडोज, ऐसी , और वो सभी आराम थे जो आप एक बढ़िया मॉडर्न कार में सोच सकते हैं. कार अपने आप में एक बढ़िया उत्पात थी पर 11 लाख की कीमत उस वक्त के हिसाब से काफी ज्यादा थी। 1995 तक सिपानी काफी गहरे आर्थिक संकट में थी और इसलिए यह करें बनाने और बेचने की स्थिति में नहीं थी और इनकी काफी कम बिक्री थी।

स्टैण्डर्ड 2000 (1985-1988)

क्यों फ्लॉप हुई: अंडरपॉवर्ड इंजन, ख़राब गियरबॉक्स, और घटिया माइलेज !

standard 2000 india photo

चेन्नई आधारित स्टैण्डर्ड मोटर्स द्वारा बनायीं गयी स्टैण्डर्ड 2000 भारत में अपने समय से पहले आयी. ये 1985 में लांच  गयी पर तीन साल के अंदर ही मार्केट से गायब हो गयी. स्टैण्डर्ड 2000 की बॉडी रोवर SD-1 से ली गयी।  उस वक्त ये 2.2 लाख में उपलब्ध थी और मार्किट में एक बेहतरीन लक्ज़री कार के रूप में देखि जाती थी। इसमें बढ़िया ऐसी, बेहतरीन फिट और फिनिश, स्पेसियस इंटीरियर्स, पावर विंडोज, और हाइड्रोलिक पावर स्टीयरिंग थी।  इसके डैशबोर्ड पर इतने सारे गेज थे की ये एयरक्राफ्ट की तरह लगता था।  मगर इसका इंजन इसकी सबसे बड़ी खामी थी।  स्टैण्डर्ड ने 2-लीटर 4-सिलिंडर पैट्रॉल इंजन का इस्तमाल किया जो की 1984 की डिजायन की गयी पुरानी वैनगार्ड से लिया गया था।  इसको एक घटिया 4-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन से मिलाया गया जो की स्टैण्डर्ड 10 वैन से लिया गया था।  कार का माइलेज करीब 6 किलोमीटर प्रति लीटर था जो की काफी ख़राब था।  कुछ स्टैण्डर्ड 2000 मालिकों ने इंजन और गियरबॉक्स हटा के इम्पोर्टेड टोयोटा और निसान डीजल यूनिट लगाईं।  यह काफी कामयाब रहीं मगर पार्ट्स की कमी और स्टैण्डर्ड मोटर्स की ख़राब मार्केटिंग की वजह से यह नाकाम रहीं.     

मारुती बलेनो अल्तुरा (2002-2005)

क्यों फ्लॉप हुई: भारत में स्टेशनवैगन की कोई जगह नहीं, बहुत महँगी

maruti baleno altura india photo

मारुती करों के मामलों बहुत कम ही नाकाम हुई है. मगर उसकी सब से बड़ी नाकामियों में एक है बलेनो अल्तुरामारुती बलेनो का स्टेशनवैगन  संस्करण। बलेनो खुद प्रतियोगिता में कुछ ख़ास नहीं कर सकी. मगर अल्तुरा बलेनो सेडान के बाद 2002 में लांच की गयी जिसमे 1.6 लीटर 94 बीएचपी पेट्रोल इंजन है. मगर अपने अच्छे लुक्स और व्यवहारिकता के बावजूद अल्तुरा खरीददारों को रिझा नहीं सकी।  परेशानी फिर से कीमत ही थी जो की उस वक्त भी 7.5 लाख थी।  प्रतियोगिता को देखते हुए यह थोड़ा महंगा था। अल्तुरा का उत्पादन 2005 में बंद कर दिया गया जबकि बलेनो सेडान 2007 में अच्छे दौर के बाद बंद हुई.        

महिंद्रा वायेजर (1997-2000)

क्यों फ्लॉप हुई: महँगी वैन, अपने समय से पहले

mahindra voyager india photo

जब महिंद्रा बेहतर यूटिलिटी व्हीकल बना पाया जो की यात्रियों को आराम से ले जा सके, उससे पहले उसने मित्सुबिशी के साथ मिलकर एक बड़ी वैन लांच करके मारुती ओमनी को टक्कर देने की को कोशश की वायेजर 1997 लांच की गयी जिसमे 2.1 लीटर का पियुगियोट डीजल इंजन था जो महिंद्रा एमएम 540 में इस्तेमाल हुआ और इसमें 5-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन लगा हुआ है. ये उन पहली एमयूवी में थी जिनमे बहुत इंटीरियर स्पेस और कम्फर्ट एंड ड्यूलरो एयरकंडीशनिंग थी।  मगर 5 लाख रूपए की कीमत पे इसे काफी कम खरीदार  मिले।  इसकी दुर्भाग्यपूर्ण यात्रा के बाद 2000  में इसका प्रोडक्शन बंद कर दिया गया।