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भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

पीएल पयोगोट 309 (1994-1997)

क्यों फ्लॉप हुई: कंपनी फ्लॉप हुई, कार बेहतरीन थी !

भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

पयोगोट 309 प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड (पीएल) के साथ एक संयुक्त उद्यम के अंतर्गत 1994 में लांच की गयी थी।  इसमें वो सभी खूबियां थीं जो इसे एक बेहतरीन कार बनाती और भारतीय बाजार में आने पे इससे काफी अच्छा रिसेप्शन मिला।  इसमें एक काफी ईधन कुशल 1.5 लीटर का डीजल इंजन था और साथ में एक मजबूत 1.4 लीटर 75 बीएचपी इंजन भी। पयोगोट 309 का 58  बीएचपी डीजल इंजन मारुती एस्टीम डीजल, जेन डीजल, और हुंडई एक्सेंट डीजल में भी इस्तेमाल हुआ. पयोगोट 309 एक मज़बूत कार थी और बेहतरीन ग्राउंड क्लीयरेंस और बेहतर रोड मैनर्स इसकी अन्य खूबियां थीं।  मगर कंपनी इसे अच्छी तरह मार्किट करने और अच्छी सर्विस उपलब्ध करने में विफल रही. पीएल में श्रमिक और आर्थिक समस्या के कारण संयुक्त उद्यम 1997 में ख़त्म हो गया और साथ में कार भी।

ओपल वेक्ट्रा (2002-2004)

क्यों फ्लॉप हुई: विचित्र इलेक्ट्रॉनिक्स, अपने वक्त से पहले

भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

ओपल वेक्ट्रा एक ऐसी लक्ज़री कार थी जिसमें भारत में डीसेगमेंट का नेतृत्व करने की क्षमता थी।  इसकी कीमत 2002 में इसके लांच के समय करीब 16 लाख रूपए थी।  इसमें एक मज़बूत 2.2-लीटर 146 बीएचपी इंजन था जिसके साथ 5-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन जुड़ा हुआ था।  मगर कार में काफी सारी परेशानियां थीं इसके काफी पेचीदा इलेक्ट्रॉनिक्स से जुडी हुईं. इसमें कई ऑनबोर्ड डायग्नोस्टिक सॉफ्टवेयर थे पर यह भारत की ड्राइविंग कंडीशंस को नहीं संभल सकी और इसलिए ज्यादातर समय सर्विस स्टेशन में बिताया। ये केवल दो साल के लिए बिकी और फिर  जनरल मोटर्स ने इसे बंद कर दिया।कंपनी वैसे भी भारत में ओपल ब्रांड को बंद कर रही थी और चेवरोलेट ब्रांड पर ध्यान दे रही थी।  

फोर्ड मोंडो (2002-2007)

क्यों फ्लॉप हुई: बहुत महँगी, अपने वक्त से पहले

भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

भारत के लक्ज़री कार मार्किट में प्रवेश करने की फोर्ड की कोशिशें भी काफी सीमित कामयाबी पा सकीं। मोंडो एक ऐसी कार है जिसने विश्व भर में अच्छी बिक्री  देखि मगर भारत में डीसेगमेंट के खरीददारों को 2002  में इम्पोर्ट के तौर पर अपने लांच में ना लुभा सकी।  ये एक बेहतरीन ड्राइवर कार थी और कुछ कार प्रेमियों को लुभाने में सफल रही।  मगर आमतौर पर खरीददारों को नहीं लगा की ये एकॉर्ड और कैमरी जैसे अपने प्रतिद्वंदियों के मुकाबले वैल्यूफारमनी विकल्प है।  इसमें 2-लीटर 142 बीएचपी का पैट्रॉल इंजन था  जिसके साथ 5-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन था. इसका एक 2लीटर 128 बीएचपी का डायूराटोर्क संस्करण था जो काफी फ्यूलएफिसिएंट था। मगर पेट्रोल संस्करण चलाने का लुफ्त ही कुछ और था।  

सान स्टॉर्म (1998-)

क्यों फ्लॉप हुई: छद्म स्पोर्ट्स कर, अंडरपॉवर्ड, ख़राब मार्केटिंग और सेल्स नेटवर्क

भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

स्टैण्डर्ड  हेराल्ड के बाद सान स्टॉर्म भारत की पहली और इकलौती कनवर्टिबल कार थी जो की 1998 में गोवा में बनायी गयी थी। सान मोटोर्स को किंगफ़िशर के मुखिया विजय माल्या ने खरीद लिया और भारत में पहली कनवर्टिबल स्पोर्ट्स कार और कूप संस्करण मार्किट करने का प्रयास किया. ये टूसीटर कार पूर्ण रूप से फाइबर ग्लास से बनी थी और इसलिए काफी हल्की थी।  इसमें रनॉल्ट से लिया गया एक 1.2 लीटर 60 बीएचपी  इंजन था जो की आम हैचबैक्स के लगभग बराबर था और स्पोर्टी परफॉरमेंस के हिसाब से ज्यादा नहीं था।  इसमें 5-स्पीड मैन्युअल ट्रांसमिशन था और सामान रखने लिए काफी काम जगह. इसे गोवा स्थित सान मोटोर्स से आज भी आर्डर किया जा सकता है मगर पिछले कुछ सालों में चंद कारों की ही बिक्री  हुई है।  

चेवरोलेट असआरवी (2006-2009)

क्यों फ्लॉप हुई: भारतीय खरीददारों के लिए एक काफी महंगी हैचबैक्स 

भारत में फ्लॉप कार्स की लम्बी सूची (Part 2)

चेवरोलेट असआरवी चेवरोलेट ऑप्ट्रा का हैचबैक्स  संस्करण थी जो की भारत में 2006 में लांच हुई।  ये उस वक्त की ज़्यादातर प्रीमियम हैचबैक्स में से सब से ज़्यादा प्रीमियम थी और इसकी कीमत करीब 7 लाख रुपय थी।  इसमें 1.6 लीटर 100 बीएचपी पैट्रॉल इंजन था और सभी मेकेनिकल्स ऑप्ट्रा सेडान पर आधारित थे. कार में काफी इंटीरियर स्पेस था और हैंडलिंग भी अच्छी थी और हैचबैक्स के लिहाज़ से काफी स्पेसियस थी।  मगर इसे करीब तीन साल बाद 2009 में इसकी प्रीमियम प्राइसिंग के कारण और इसलिये  की भारतीय बाजार इतनी बड़ी हैचबैक्स के लिए तैयार नहीं थे बंद कर दिया गया। इसकी बिक्री काफी काम हुई।  पार्ट्स मिलने में दिक्कत हालाँकि नहीं होती क्योंकि ऑप्ट्रा सेडान अभी भी प्रोडक्शन में है।  

ये 10 कारें हैं जो हमें लगता है की भारत में वाकई नाकाम रहीं।  टाटा एस्टेटप्रीमियर पद्मिनी ( स्टारलाइन) का स्टेशनवैगन संस्करणऔर महिंद्रा स्कार्पियो पेट्रोल रैव 116 का नाम भी इस सूची में हो सकता है. इसके आलावा भी कारें हैं जो भारत में नहीं बिक रही हैं।  उदाहरण के लिए मारुती ग्रैंड विटारा और मित्सुबिशी ऑउटलैंडर। ये कारें शायद बंद कर  दी जाएं अगर इनकी ख़राब परफॉरमेंस जारी रहती है तो।  क्या आपके पास ऐसी कार है या आप ऐसी किसी कार के बारे में सोच सकते हैं जो भारत में विफल रहीं कारों की सूची में होनी चाहिए। कमैंट्स में हमें बताएं !